क्या राजा- रजवाड़ों के कारण भारत ब्रिटिश हाथों में चला गया था ? ( Did India go into British hands because of the princely states?)

  
           मध्यकाल के अन्त में भारत में केंद्रीय शक्ति मुगल साम्राज्य के पतन तथा मुगल उतराधिकारी संघर्ष के परिणामस्वरूप कई क्षेत्रीय शक्तियों / रजवाड़ों ने अपने आप को स्वतंत्र घोषित कर दिया था। इसमें कुछ महत्वपूर्ण रियासते मैसूर, कर्नाटक, हैदराबाद, बंगाल, मराठा रजवाड़े, मारवाड़ के राजपूती रजवाड़े, जूनागढ़, कश्मीर रियासत तथा उत्तर पश्चिम में सिख रियासत प्रमुख थी। अब ये प्रश्न उठता है। कि क्या इन रियासतों  के आपसी स्वार्थों कारण भारत अंग्रेजों का गुलाम बना? आइए जानते है!
                   (भारतीय रियासत कालीन मैप)

    भारत में मुगलों के पतन के कारण भारत में केंद्रीय शक्ति शून्यता का अभाव के कारण रजवाड़ों ने अपने आप को स्वायत घोषित कर अपनी सीमाओं का निर्धारण कर दिया। 
परंतु इन्ही रजवाड़ों की राज्य विस्तार की इच्छा, अपने राज्यों को बढ़ाने की कवायत ने आपसी संघर्ष को जन्म दिया। 

दूसरी तरफ भारत में ब्रिटिश कंपनियां अपने धीरे - धीरे अपने पैर पसार रही थी। ब्रिटिश कंपनियां किसी मौके की तलास में थी। ताकि अपना व्यापार बढ़ा सके। रजवाड़ों के आपसी झगड़ो ने अंग्रेजों को वो मौका मिल ही गया। अंग्रेज रजवाड़ों के आपसी झगड़ो में हस्तक्षेप कर अपनी शक्ति तथा अपने व्यापार का विस्तार करने लगी। राजाओं के आपसी संघर्ष से रजवाड़े कमजोर पड़ने लगे। उसका पूरा पूरा फायदा यूरोपीय शक्तियों ने उठाया। धीरे - धीरे यूरोपीय शक्तियों द्वारा राज्यों के आंतरिक तथा बाह्य आक्रमण सुरक्षा सहायक संधि बहाने राज्य के आंतरिक तथा बाह्य नीतियों पर हस्तक्षेप करने लगी। रजवाड़ों की विदेश नीति लगभग ब्रिटिशों के हाथों में स्थानांतरण हो गई थी। अब रियासतें बिना अंग्रेजों के परमिशन के बिना ना पड़ोसी राज्यों से संबंध बना सकती थी। और ना आक्रमण कर सकती थी। साथ ही साथ राज्यों के आंतरिक नीति में भी अप्रत्यक्ष रूप से हस्तक्षेप करने लगी। परंतु भारतीय रजवाड़े यह नहीं समझ पा रहे थे, कि अंग्रेज किस प्रकार अपनी शक्ति का विस्तार कर रहे हैं। मात्रा अपने स्वार्थों के कारण राज्य रजवाड़े अंग्रेजों का आजादी तक गुलाम बनकर रहना पड़ा।

     ब्रिटिश शासन कुछ हद तक रजवाड़ों की आंतरिक विद्रोह तथा बाहरी आक्रमण की चुनौतियां से सुरक्षा प्रदान करती थी। बदले में ब्रिटिश शासन ने इन राज्यों के राष्ट्रीय एकता के विकास में बाधा डालने तथा उदीयमान राष्ट्रीय आंदोलन का मुकाबला करने के लिए ब्रिटिश अधिकारी अभी राजाओं का इस्तेमाल किया। 1857 की क्रांति में यदि अंग्रेजों को रजवाड़ों का साथ नही मिलता तो आज स्थिति कुछ और होती।
        
    ब्रिटिश सरकार भी राजाओं को राजी रखने के लिए भी बहुत सी नीतियां भी लाई। सन 1921 में चेंबर ऑफ प्रिंसेस की स्थापना की गई ताकि राजा महाराजा मिल सके और ब्रिटिश मार्गदर्शन में अपने सारे हित के विषय पर विचार कर सके।  1935 का भारत सरकार अधिनियम के संघीय ढांचे की योजना के उच्च सदन की कुल सीटो में से 2/5 तथा निचले सदन में 1/3 पर, रजवाड़ों के प्रतिनिधि रखे गए।
   
   संविधान निर्माण में भी राजा - रजवाड़ों को अलग सीटो को व्यवस्था तथा अंत स्वतंत्रता के समय देसी रजवाड़ों को भारत या पाकिस्तान में शामिल होने या स्वयं को स्वतंत्र रखने का विकल्प।   

    यदि भारतीय रजवाड़े में आपसी राष्ट्रभक्ति और एकता को कायम रहती। तो आज अंग्रेज शायद समूर्ण भारत में इतना बड़ा साम्राज्य स्थापित नहीं कर पाती।

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