चोल मंदिर वास्तुकला

          
          चोल शासकों के संरक्षण में दक्षिण भारत में सैकड़ों मंदिर बनवाए गए। इनमें पल्लव वास्तुकला की निरंतरता थी। साथ ही कुछ बदला भी थे। इसे मंदिर वास्तुकला की द्रविड़ शैली का रूप में जाना जाने लगा।
• मंदिर वास्तुकला की द्रविड़ शैली की विशेषताएं !

• नागर मंदिरों के विपरीत, द्रविड़ शैली के मंदिर ऊंची चारदीवारी से घिरे होते थे।

• सामने की दीवार में एक ऊंचा प्रवेश द्वार होता था, जिसे गोपुरम कहा जाता था।

• मंदिर का निर्माण पंचायत शैली में किया जाता था। जिसमें एक प्रधान तथा 4 गोण मंदिर होते थे।

• द्रविड़ शैली के मंदिरों में पिरामिडनुमा शिखर होते थे जो घुमावदार नहीं बल्कि ऊपर की तरह सीधे होते थे। शिखर को विमान कहा जाता था।

• विमान के शीर्ष पर एक अष्टकोण आकार का शिखर होता था। यह नागर मंदिर के कलश के समान है लेकिन यह गोलाकार में नहीं होता था।

• द्रविड़ वास्तुकला में केवल मुख्य मंदिर के शीर्ष पर विमान होता था। इसमें नागर वास्तुकला के विपरीत अन्य सहायक मंदिरों पर विमान नहीं होता था।

• सभा हॉल गर्भ गृह से एक गलियारों द्वारा जुड़ा होता था, जिसे अंतराल का जाता था।

• गर्भ ग्रह के प्रवेश द्वार पर द्वारपाल, मिथुन और यक्ष की मूर्तियां होती थी।

• मंदिर परिसर के अंदर एक जलाशय की उपस्थिति द्रविड़ शैली की एक अद्वितीय विशेषता थी।

• चोल कालीन मंदिर ----
1. तजावुर का बृहदेश्वर मंदिर 
      बृहदेश्वर मंदिर तमिलनाडु के तंजौर में स्थित एक हिंदू मंदिर है जो 11वीं सदी के आरम्भ में राजराज चोल बनाया गया था। यह मंदिर पूरी तरह से ग्रेनाइट नि‍र्मि‍त है। विश्व में यह अपनी तरह का पहला और एकमात्र मंदिर है जो कि ग्रेनाइट का बना हुआ है।इस मंदिर को यूनेस्को ने विश्व धरोहर घोषित किया है। 

2. गंगेईकोंड चोलपुरम मंदिर
      यह लगभग 1025 ई में राजेन्द्र चोल प्रथम द्वारा गंगा डेल्टा में अपनी जीत की उपलक्ष में निर्मित किया गया था।

3. ऐरावतेश्वर मंदिर
        
        12वीं सदी में राजराजा चोल द्वितीय द्वारा निर्मित इस मंदिर को तंजावुर के बृहदीश्वर मंदिर तथा गांगेयकोंडा चोलापुरम के गांगेयकोंडाचोलीश्वरम मंदिर के साथ यूनेस्को द्वारा वैश्विक धरोहर स्थल बनाया गया।

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