रेयतवाड़ी व्यवस्था क्या थी ? इसकी विशेषताएं, उद्देश्य तथा किसानों को किस प्रकार प्रभावित किया।

        
       रेयतवाड़ी व्यवस्था एक प्रकार की ब्रिटिश सरकार द्वारा अपनायी भू राजस्व की नई पद्धति थी। मद्रास के तत्कालीन गवर्नर टॉमस मनरो द्वारा 1820 में प्रारंभ की गई इस व्यवस्था को मद्रास, बम्बई एवं असम के कुछ भागों में लागू की गई। बम्बई में इस व्यवस्था को लागू करने में बम्बई के तत्कालीन गवर्नर एलफिंस्टन ने महत्वपूर्ण योगदान दिया।

• रेयतवाड़ी व्यवस्था की मुख्य विशेषताएं ---

1. किसानों के साथ सीधा बंदोबस्त। जमीदारों के स्थान पर किसानों को भू- स्वामी बनाना तथा ब्रिटिश सरकार ने किसानों के साथ सीधा अलग- अलग समझौते किए।

2. भू राजस्व का निर्धारण वास्तविक उपज की मात्रा के आधार पर ना करके भूमि के क्षेत्रफल के आधार पर किया गया।

3.  ब्रिटिश भारत की 51% भूमि पर लागू की गई।
• रेयतवाड़ी व्यवस्था लागू करने के उद्देश्य ----

1. बिचौलियों (जमीदारों) के वर्ग को समाप्त करना था। क्योंकि स्थायी बंदोबस्त में निश्चित राशि से अधिक वसूल की गई सारी रकम जमीदारों द्वारा हड़पी जाती थी तथा सरकार की आय में कोई वृद्धि नहीं होती थी। अंतः आय में वृद्धि करने के लिए सरकार ने इस व्यवस्था को लागू किया ताकि वह बिचौलियों द्वारा रखी जाने वाली राशि को खुद हड़प सके।

2. स्थायी बंदोबस्त को दूर करना।

3. दक्षिण तथा दक्षिण पश्चिम भारत में इतने बड़े जमीदार नहीं थे। कि स्थायी बंदोबस्त की व्यवस्था अपनाई जा सके।

• हालांकि इस व्यवस्था के बारे में यह तर्क दिया गया कि यह व्यवस्था भारतीय किसान एवं भारतीय कृषि के अनुरूप हैं। किंतु वास्तविकता इससे बिल्कुल भिन्न थी। व्यावहारिक रूप में यह व्यवस्था जमीदारी व्यवस्था से किसी भी प्रकार कम हानिकारक नहीं थी।

 1. इसमें ग्रामीण समाज के सामूहिक स्वामित्व की अवधारणा को समाप्त कर दिया तथा जमीदारों का स्थान स्वयं ब्रिटिश सरकार ने ले लिया।

2. सरकार ने आधिकारिक राजस्व वसूलने के लिए मनमाने ढंग से भू-राजस्व का निर्धारण किया तथा किसानों को बलपूर्वक खेत जोतने को बाध्य किया।

3. लगान अदा न करने की स्थिति में किसानों को भूमि से बेदखल कर दिया जाता था।

4. प्राकृतिक विपदा या अन्य किसी प्रकार की कठिनाई में लगान से कोई छूट नहीं मिलती थी।

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