भारत में समाजवाद का इतिहास (History of Socialism in India)

जानेंगे कैसे भारत में समाजवाद की शुरुआत हुई?
• समाजवाद भारतीय इतिहास को किस प्रकार प्रभावित किया ।

    प्रथम विश्व युद्ध के पहले लगभग सभी देशों में  पूंजीवादी व्यवस्था का अधिक बोलबाला था। परंतु प्रथम विश्व के समाप्ति के पश्चात रूसी क्रांति (1917)  में उपजी नई कम्युनिस्ट विचारधारा ने साम्राज्यवादी राष्ट्रों के विरुद्ध विभिन्न उपनिवेशी राष्ट्रों (लेटिन अमेरिका,अफ्रीका तथा एशियाई देशों) में एक नई स्वतंत्रता की राष्ट्रवादी चेतना का विकास किया। इसी  कम्युनिस्ट विचारधारा की उपज भारत में समाजवादी विचारधारा का विकास हुआ। जो इतिहास के लेकर वर्तमान तक भारत में समाजवादी विचारधारा देख सकते है।

      सोवियत संघ द्वारा कम्युनिस्ट इंटरनेशनल द्वारा उपनिवेश देशों में साम्यवाद का प्रचार के कारण इसका प्रचार भारत में भी हुआ।  सन 1927 तक भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में समाजवाद विचार का बहुत तेजी से विकास हुआ। उस समय भारत में राष्ट्रीय कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी हुआ करती थी। राजनीतिक दृष्टि से इस शक्ति की अभिव्यक्ति कांग्रेस के अंदर एक वामपंथ के रुपए के रूप में हुई। इस नई प्रवृत्ति के नेता जवाहरलाल नेहरू और सुभाष चंद्र बोस थे। इस वामपंथ ने अपना ध्यान साम्राज्यवाद विरोधी संघर्ष तक सीमित नहीं रखा। साथ ही साथ उसने पूंजीवादियों और जमीदारों के आंतरिक वर्ग के शोषण का सवाल भी उठाया।

     इसी समाजवादी विचार से भारत के युवा राष्ट्रवादी धीरे-धीरे समाजवाद की तरफ आकर्षित होने लगे और देश के दिन राजनीतिक आर्थिक और सामाजिक बुराइयों से पीड़ित था उससे उनके लिए दूरगामी हल सुझाने लगे। साथ ही साथ गई युवा संगठनों की स्थापना भी हुई। जैसे -पहला अखिल बंगाल छात्र सम्मेलन 1928 में जवाहर लाल नेहरू की अध्यक्षता में हुआ। भारत की पूर्ण स्वतंत्रता का विचार भी समाजवादी विचारधारा से लोकप्रिय बना। 

   देश में समाजवादी और कम्युनिस्ट गुणों की स्थापना हुई। रूस की क्रांति की विख्यात घटना ने अनेक युवा राष्ट्रवादी को आकर्षित किया उनमें से अनेक गांधीवादी राजनीतिक विचारों और कार्यक्रम से असंतुष्ट थे वह मार्गदर्शन पाने के लिए समाजवादी विचारधारा की ओर मुड़े। मानवेंद्रनाथ राय कम्युनिस्ट इंटरनेशनल के नेतृत्व वर्ग में चुने गए इसके लिए चुने जाने वाले पहले भारतीय थे। 1925 में मानवेंद्रनाथ के नेतृत्व में भारत में भारत में कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना हुई। इसके अलावा देश के अनेक भागों में मजदूर - किसान पार्टियां बनी। इन पार्टियों और समूह ने मार्क्सवादी और कम्युनिस्ट विचारों का प्रचार किया। लेकिन साथ ही वह लोग राष्ट्रीय आंदोलन और राष्ट्रीय कांग्रेस के अभिन्न अंग भी थे। 
   
        इन्हीं समाजवादी विचारधारा ने 1928 में सरदार वल्लभ भाई पटेल के नेतृत्व में बारदोली का प्रसिद्ध सत्याग्रह, अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस, खड़कपुर के रेलवे वर्कशॉप की हड़ताल, दक्षिण भारतीय रेल मजदूरों की हड़ताल जमशेदपुर में टाटा के लोहा इस्पात कारखाना में हड़ताल आदि। सुभाष चंद्र बोस की इन हड़ताल में महत्वपूर्ण भूमिका थी।
                               भगतसिंह

   इस नई लहर का एक और संकेत क्रांतिकारियों के आंदोलन की गतिविधियों में देखने को मिला। अब यह आंदोलन भी समाजवाद की ओर झुक रहा था।  समाजवादी विचारों ने प्रभावित होकर 1928 में चंद्रशेखर आजाद के नेतृत्व में उन्होंने अपने संगठन का नाम बदल कर हिंदुस्तान सामाजवादी प्रजातंत्र संघ ( हिंस्प्रस) कर दिया। अपने दो अंतिम पत्रों में 23 वर्षीय भगतसिंह ने समाजवाद में अपनी आस्था भी व्यक्त की। वे लिखते हैं : किसानों को केवल विदेशी शासन ही नहीं बल्कि जमीदारी और पूंजीपतियों के जुए से भी स्वयं को मुक्त कराना होगा।
                     (समाजवादी अखबार)
 
 भारत के आजादी के बाद भी भारतीय संविधान के प्रस्तावना में तथा नीति निर्देशक तत्वों में समाजवाद के विचारों की झलक देख सकते है। आगे जाके सरकार की पंचवर्षीय योजनाओं भी समाजवाद से पोषित था।

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